!! जय हो जनक जी जय हो सुनयना जय हो जनकपुर जय हो जानकी !!


पानी न बरसे, धरती बजर भेल
राजा जी केना हम अन्न उपजाऊ
जनक जी सुनलन जैसे इ दुखरा
कहलन अहाँ सब संग हमरा आऊ।

अपने उठैलन जनक जी हर आ
चललन जोते मिथिला के धरती
धरती भेलन धन्य तुरत ही देलन
सिया सन बिटिया लछमी के मूरती।

लछमी जी ऐलन दुःख सब दूर भेल
धरती तृप्त करैत ऐसन मेघ बरसल
पेड़,पौधा, जन,मन सब भेल संतुष्ट
जेने देखू तेने प्राणी-प्राणी हरसल।

जनक जी लैलन गोदी में जानकी
धैलन सुनयना झट से अँचरा में
छाती लगवाथ, रोक न पावथ
ममता सब रहे इनके बखरा में।

होये लागल बधाई जनकपुर में
बाजे लागल ढोल,मृदंग,पीपहि
हुलस हुलस नाचे गाए पुरवासी
आनंद न जाए छिपाए सखी छिपहि ।

कोई अल्पना बनाबे बीच अँगना
कोई जाके सड़क पे गंध छिड़क़ाबे
कोई द्वार पे लगाबे केरा के थम
कोई आम के पत्ता से तोड़न बनाबे।

नेउनी, नेउना करे लागल झगड़ा
एतना न ओतना नेग चाही हमरा
रानी के आदेश लेके आएल दासी
दे दियाए नेग चाही जेतना जेकरा।

पंडित के बोलाके पतरा देखा के
जनक जी करवैलन शास्त्र विचार
पंडित जिमा अन्न अशर्फ़ी देलन
बाछी बाली गाय भी देलन हज़ार।

धन धान्य हँसी-ख़ुशी से भरल ऐसन
मिथिला लागे लागल वैकुण्ठ जैसन
स्वयं लक्ष्मी जी जानकी बनके ऐलन
संग अपन सब सुख वैभव भी लैलन।

जय हो जनक जी जय हो सुनयना
जय हो जनकपुर जय हो जानकी
जानकी से जुड़ के सबके जय हो
जय हो सियापति करुणानिधान की।





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